सरलता की गोद में बैठी एक कहानी…

सरलता की गोद में बैठी एक कहानी…

“एक तस्वीर हज़ार शब्दों के बराबर होती है।”



एक पुरानी तस्वीर, सामने साधारण सी टेबल, उस पर बिछा कागज़, देसी पत्तल में परोसा खाना, प्लास्टिक का छोटा गिलास, और पीछे टंगे पुराने टेंट के पर्दे…
इन सबके बीच बैठा एक युवा, जिसकी आँखों में वह चमक है जो अक्सर संघर्ष की तपिश में निखरती है।
वही संघर्ष, जिसे समझने के लिए बड़े-बड़े मंच, बड़े-बड़े बयान या बड़ी-बड़ी पीआर की जरूरत नहीं होती, बस ऐसे ही एक सादगी भरे पल की झलक काफी है।

आज भले ही राजनीति में कई सवाल उठते हों, कई आरोप तैरते हों, कई केस सुर्खियों में रहते हों…
लेकिन यह भी सच है कि इस देश में कई लोग बेहद साधारण जिंदगी से उठकर, कठिन परिस्थितियों को चीरकर, सदन तक अपनी जगह बनाते हैं।
और धनबाद जैसी धरती, जहाँ कभी माफियाओं का राज था, कोयले की काली दुनिया में खून और बारूद की कहानियाँ दबी पड़ी थीं, वहाँ से राजनीतिक पहचान बनाना कोई आसान यात्रा नहीं है।

धनबाद की गलियों ने वह समय भी देखा है
जहाँ कोयला सिर्फ ऊर्जा नहीं था, संघर्ष था…
जहाँ काली खदानों में सिर्फ मिट्टी नहीं, झारखंडियों का खून भी मिला था…
जहाँ सत्ता और संघर्ष का खेल इतना कठोर था कि साधारण लोग अक्सर किनारे कर दिए जाते थे।

ऐसी जमीन से उठकर, अपने दम पर कोई पहचान बनाना, चाहे राजनीति में हो, समाज में हो या जनप्रतिनिधित्व में, वह सफर हमेशा कठिन और काँटों भरा ही होता है।
यह तस्वीर उसी सफर की एक झलक लगती है, जहाँ चमक-दमक नहीं थी, बस सादगी, संघर्ष और आगे बढ़ने की इच्छा थी।

सोशल मीडिया पर धनबाद सांसद ढुलू महतो कि यह तस्वीर वायरल हुई, और शायद वायरल इसलिए हुई क्योंकि लोग आज भी ऐसे सादगी भरे बीते दिनों को देखकर हैरान भी होते हैं और भावुक भी।
क्योंकि यह याद दिलाता है कि हर बड़ी पहचान के पीछे एक छोटा, मिट्टी-सा साधारण आरंभ होता है।

हमने सोचा, जब तस्वीर लोगों के बीच घूम ही रही है…
तो इसे आपको जैसा का तैसा न देकर, थोड़ा भाव और थोड़ा संघर्ष का स्वाद मिलाकर परोस दें।
जैसे देसी पत्तल में परोसा खाना, सादा भी, सच्चा भी।

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